Electromagnetic Induction यानि कि विद्युत चुंबकीय प्रेरण,
सन 1820 में वैज्ञानिक ओर्स्टेड में यह जान लिया था कि यदि किसी कंडक्टर में विद्युत धारा है तो उसके चारों तरफ चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है इसके पश्चात फैराडे जो भी एक वैज्ञानिक थे उन्होंने यह विचार किया कि अगर विद्युत धारा से चुंबकीय क्षेत्र पैदा हो रहा है तो चुंबकीय क्षेत्र से भी विद्युत धारा उत्पन्न होनी चाहिए इसी सोच को सच साबित करने के लिए, अपने इसी विचार को सही करने के लिए उन्होंने काफी समय तक एक चुंबक और एक कुंडली के बीच में काफी एक्सपेरिमेंट किया. कहते हैं कि वह अपने प्रयोगों में काफी समय तक असफल रहे थे. उसके बाद उन्होंने बड़े गुस्से में चुंबक को उस कुंडली के अंदर से फेंका जब उन्होंने ऐसा किया तो कुंडली में जिसमें कि एक धारामापी /अमीटर लगा हुआ था,उसमें एक विक्षेप हुआ.
यह रिजल्ट देखने के बाद फैराडे अत्यंत प्रसन्न हुए, क्योंकि उन्हें वह मिल चुका था जिसके लिए वह इतने सारे एक्सपेरिमेंट कर रहे थे. उनको ज्ञात हो चुका था कि चुंबक को कुंडली के अंदर फेंकने से एक क्षण भर के लिए ही विद्युत धारा बही, जबकि विद्युत धारा/करंट के लिए कोई भी स्रोत नहीं था अर्थात कुंडली के सिरों पर कोई भी बैटरी नहीं जोड़ी गई थी.उनके इस प्रयोग से तो एक बात स्पष्ट थी कि अगर कुंडली और चुंबक को बड़ी तेजी से एक दूसरे के सामने लाते हैं अथवा तेजी से दूर ले जाते हैं उस स्थिति में कुंडली से जुड़े अमीटर में एक डिफलेक्शन/विक्षेप मिलता है. अर्थात चुम्बक और कुंडली के बीच की सापेक्ष गति विद्युत धारा में परिवर्तित हो रहा था. इसका मतलब गति का विद्युत धारा में रूपांतरण हो रहा था जैसा कि आप ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार जानते हैं कि ऊर्जा को न तो पैदा किया जा सकता हैऔर न ही उसको नष्ट किया जा सकता है. ऊर्जा का केवल एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरण ही संभव है जैसा कि इस प्रयोग से भी स्पष्ट है. यहां पर गतिज ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित हो रही है, जो ऊर्जा संरक्षण नियम को भी सही साबित करता है.
फैराडे ने अपने प्रयोग से कई सारे रिजल्ट निकालें थे, जो निम्नवत हैं-
1. जब हम कुंडली की तरफ चुंबक के उत्तरी ध्रुव को तेजी से लाते हैं तब हम देखते हैं कुंडली में धारा की दिशा इस तरह से हो जाती है कि चुंबक के उत्तरी ध्रुव की तरफ ही कुंडली का उत्तरी ध्रुव पैदा हो जाता है. ठीक इसी प्रकार जब चुंबक के उत्तरी ध्रुव को तेजी से कुंडली से दूर ले जाते हैं, तब देखते हैं कि कुंडली में धारा की दिशा इस तरह हो जाती है कि नजदीक वाले सिरे पर दक्षिणी ध्रुव विकसित हो जाता है.दोनों ही स्थिति में कुंडली में विकसित होने वाली धारा की दिशा इस प्रकार होती है जिससे वह चुंबक के सापेक्ष गति का विरोध कर सके.
2. प्रत्येक दिशा में अमीटर में विक्षेप केवल तभी हो रहा था, जब तक चुंबक गतिशील है. जैसे ही चुंबक को रोक देते हैं विक्षेप भी गायब हो जाता है अर्थात धारा बंद हो जाती है.
3.चुंबक को जितनी तेजी से चलाते हैं डिफैक्शन /विक्षेप भी उतना ही ज्यादा होता है अर्थात करंट की इंटेंसिटी इस बात पर भी निर्भर करती है कि चुंबक और क्वायल के बीच में सापेक्ष गति कितनी अधिक है
4.अगर कुंडली में No.of turn /फेरों कि संख्या बढ़ा दें अथवा कुंडली के भीतर एक मुलायम नरम लोहा का कोर रख दें, तो भी हम देखते हैं कि करंट के इंटेंसिटी बढ़ जाती है
5.यदि कुंडली के साथ कोई हाई रेजिस्टेंस /उच्च प्रतिरोध जोड़ दिया जाए तो करंट की वैल्यू कम हो जाती है
6.अगर चुंबक को स्थिर रखें और क्वायल/कुंडली को चुंबक की तरफ तेजी लाएं, तो भी अमीटर में विक्षेप उत्पन्न होता है इसका मतलब है या तो चुंबक अथवा क्वायल दोनों में से किसी को भी अगर एक दूसरे से दूर ले जाया जाए अथवा एक दूसरे के समीप लाया जाएगा अर्थात जब भी कभी चुंबक और कुंडली के बीच में सापेक्ष गति होगी उस स्थिति में धारामापी/अमीटर में विक्षेप अवश्य होगा. इन एक्सपेरिमेंट से फैराडे ने एक निष्कर्ष निकाला कि जब भी किसी कुंडली अथवा चुंबक के बीच में सापेक्ष गति होती है तो कुंडली में एक विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है जिसे Induced e.m.f. अथवा प्रेरित विद्युत वाहक बल कहते हैं और और इस घटना को ही विद्युत चुंबकीय प्रेरण अथवा Electromagnetic Induction कहते हैं. अगर कुंडली एक बंद परिपथ अथवा closed circuit है तो प्रेरित विद्युत वाहक बल के कारण कुंडली में एक विद्युत धारा प्रवाहित होती है जिसे प्रेरित धारा कहते हैं. जो प्रेरित विद्युत वाहक बल होता है वह कुंडली के प्रतिरोध पर निर्भर नहीं करता परंतु बहने वाली धारा, परिपथ के resistance पर निर्भर करती है.
सन 1820 में वैज्ञानिक ओर्स्टेड में यह जान लिया था कि यदि किसी कंडक्टर में विद्युत धारा है तो उसके चारों तरफ चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है इसके पश्चात फैराडे जो भी एक वैज्ञानिक थे उन्होंने यह विचार किया कि अगर विद्युत धारा से चुंबकीय क्षेत्र पैदा हो रहा है तो चुंबकीय क्षेत्र से भी विद्युत धारा उत्पन्न होनी चाहिए इसी सोच को सच साबित करने के लिए, अपने इसी विचार को सही करने के लिए उन्होंने काफी समय तक एक चुंबक और एक कुंडली के बीच में काफी एक्सपेरिमेंट किया. कहते हैं कि वह अपने प्रयोगों में काफी समय तक असफल रहे थे. उसके बाद उन्होंने बड़े गुस्से में चुंबक को उस कुंडली के अंदर से फेंका जब उन्होंने ऐसा किया तो कुंडली में जिसमें कि एक धारामापी /अमीटर लगा हुआ था,उसमें एक विक्षेप हुआ.
यह रिजल्ट देखने के बाद फैराडे अत्यंत प्रसन्न हुए, क्योंकि उन्हें वह मिल चुका था जिसके लिए वह इतने सारे एक्सपेरिमेंट कर रहे थे. उनको ज्ञात हो चुका था कि चुंबक को कुंडली के अंदर फेंकने से एक क्षण भर के लिए ही विद्युत धारा बही, जबकि विद्युत धारा/करंट के लिए कोई भी स्रोत नहीं था अर्थात कुंडली के सिरों पर कोई भी बैटरी नहीं जोड़ी गई थी.उनके इस प्रयोग से तो एक बात स्पष्ट थी कि अगर कुंडली और चुंबक को बड़ी तेजी से एक दूसरे के सामने लाते हैं अथवा तेजी से दूर ले जाते हैं उस स्थिति में कुंडली से जुड़े अमीटर में एक डिफलेक्शन/विक्षेप मिलता है. अर्थात चुम्बक और कुंडली के बीच की सापेक्ष गति विद्युत धारा में परिवर्तित हो रहा था. इसका मतलब गति का विद्युत धारा में रूपांतरण हो रहा था जैसा कि आप ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार जानते हैं कि ऊर्जा को न तो पैदा किया जा सकता हैऔर न ही उसको नष्ट किया जा सकता है. ऊर्जा का केवल एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरण ही संभव है जैसा कि इस प्रयोग से भी स्पष्ट है. यहां पर गतिज ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित हो रही है, जो ऊर्जा संरक्षण नियम को भी सही साबित करता है.
फैराडे ने अपने प्रयोग से कई सारे रिजल्ट निकालें थे, जो निम्नवत हैं-
1. जब हम कुंडली की तरफ चुंबक के उत्तरी ध्रुव को तेजी से लाते हैं तब हम देखते हैं कुंडली में धारा की दिशा इस तरह से हो जाती है कि चुंबक के उत्तरी ध्रुव की तरफ ही कुंडली का उत्तरी ध्रुव पैदा हो जाता है. ठीक इसी प्रकार जब चुंबक के उत्तरी ध्रुव को तेजी से कुंडली से दूर ले जाते हैं, तब देखते हैं कि कुंडली में धारा की दिशा इस तरह हो जाती है कि नजदीक वाले सिरे पर दक्षिणी ध्रुव विकसित हो जाता है.दोनों ही स्थिति में कुंडली में विकसित होने वाली धारा की दिशा इस प्रकार होती है जिससे वह चुंबक के सापेक्ष गति का विरोध कर सके.
2. प्रत्येक दिशा में अमीटर में विक्षेप केवल तभी हो रहा था, जब तक चुंबक गतिशील है. जैसे ही चुंबक को रोक देते हैं विक्षेप भी गायब हो जाता है अर्थात धारा बंद हो जाती है.
3.चुंबक को जितनी तेजी से चलाते हैं डिफैक्शन /विक्षेप भी उतना ही ज्यादा होता है अर्थात करंट की इंटेंसिटी इस बात पर भी निर्भर करती है कि चुंबक और क्वायल के बीच में सापेक्ष गति कितनी अधिक है
4.अगर कुंडली में No.of turn /फेरों कि संख्या बढ़ा दें अथवा कुंडली के भीतर एक मुलायम नरम लोहा का कोर रख दें, तो भी हम देखते हैं कि करंट के इंटेंसिटी बढ़ जाती है
5.यदि कुंडली के साथ कोई हाई रेजिस्टेंस /उच्च प्रतिरोध जोड़ दिया जाए तो करंट की वैल्यू कम हो जाती है
6.अगर चुंबक को स्थिर रखें और क्वायल/कुंडली को चुंबक की तरफ तेजी लाएं, तो भी अमीटर में विक्षेप उत्पन्न होता है इसका मतलब है या तो चुंबक अथवा क्वायल दोनों में से किसी को भी अगर एक दूसरे से दूर ले जाया जाए अथवा एक दूसरे के समीप लाया जाएगा अर्थात जब भी कभी चुंबक और कुंडली के बीच में सापेक्ष गति होगी उस स्थिति में धारामापी/अमीटर में विक्षेप अवश्य होगा. इन एक्सपेरिमेंट से फैराडे ने एक निष्कर्ष निकाला कि जब भी किसी कुंडली अथवा चुंबक के बीच में सापेक्ष गति होती है तो कुंडली में एक विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है जिसे Induced e.m.f. अथवा प्रेरित विद्युत वाहक बल कहते हैं और और इस घटना को ही विद्युत चुंबकीय प्रेरण अथवा Electromagnetic Induction कहते हैं. अगर कुंडली एक बंद परिपथ अथवा closed circuit है तो प्रेरित विद्युत वाहक बल के कारण कुंडली में एक विद्युत धारा प्रवाहित होती है जिसे प्रेरित धारा कहते हैं. जो प्रेरित विद्युत वाहक बल होता है वह कुंडली के प्रतिरोध पर निर्भर नहीं करता परंतु बहने वाली धारा, परिपथ के resistance पर निर्भर करती है.